राजस्थान के डूंगरपुर जिले से आस्था, त्याग और समर्पण की एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। आसपुर तहसील के खेड़ा सामोर गांव के निवासी किसान अमरजी गौतम पाटीदार ने अपनी पूरी पैतृक संपत्ति भगवान श्री सांवलिया सेठ मंदिर ट्रस्ट के नाम समर्पित कर दी है। आज के दौर में जहां लोग एक-एक इंच जमीन के लिए आपसी विवादों में उलझ जाते हैं, वहीं अमरजी का यह कदम समाज के लिए त्याग की बहुत बड़ी मिसाल बन गया है।
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डेढ़ करोड़ की संपत्ति ईश्वर के चरणों में अर्पित
दान की गई इस संपत्ति का अनुमानित मूल्य करीब डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक बताया जा रहा है। इसमें लगभग 10.15 बीघा उपजाऊ कृषि भूमि, 30 आम के हरे-भरे फलदार पेड़ और रहने के लिए बना एक भव्य चार मंजिला मकान शामिल है। अकेले इस चार मंजिला मकान की कीमत ही लगभग एक करोड़ रुपये आंकी जा रही है। अपनी पूरी धन-दौलत और आशियाना मंदिर ट्रस्ट को सौंपने के बाद अब अमरजी गौतम का जीवन केवल अपने 19 पशुओं के सहारे ही व्यतीत होगा।
किशोरावस्था में ही अपना लिया था भक्ति का मार्ग
गांव के बुजुर्गों और स्थानीय निवासियों के अनुसार अमरजी का जीवन शुरू से ही सादगी और ईश्वर भक्ति से भरा रहा है। सामाजिक परंपराओं के चलते उनका विवाह बाल्यावस्था में ही कर दिया गया था। हालांकि, महज 15 वर्ष की आयु में ही उन्होंने सांसारिक जीवन और मोह-माया से दूरी बना ली। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान प्रभु भक्ति और अपनी पैतृक जिम्मेदारियों को निभाने में ही लगाया।
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2016 में लिया संकल्प, 10 साल तक लड़ी कानूनी लड़ाई
अमरजी गौतम ने बताया कि वर्ष 2016 में ही उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति मेवाड़ के प्रसिद्ध श्री सांवलिया सेठ मंदिर के नाम करने का मन बना लिया था। लेकिन यह राह उतनी आसान नहीं थी। जमीन पर बकाया ऋण, अलग-अलग खातों में दर्ज भूमि और जटिल कानूनी प्रक्रियाओं के कारण यह मामला उलझ गया। दान की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए उन्हें लगभग 10 साल तक कड़ा संघर्ष करना पड़ा।
100 से अधिक चक्कर काटकर पूरे करवाए दस्तावेज
लंबी कानूनी अड़चनों के बावजूद अमरजी ने कभी हार नहीं मानी। अपनी मन्नत और संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने सरकारी दफ्तरों, प्रशासनिक अधिकारियों और मंदिर ट्रस्ट के 100 से भी ज्यादा चक्कर काटे। हर एक कागजात और कानूनी औपचारिकता को खुद खड़े रहकर पूरा करवाया। आखिरकार उनकी 10 साल की अटूट मेहनत और भक्ति रंग लाई और जमीन व मकान का दान सफलतापूर्वक संपन्न हो सका।
"जो कुछ था सांवलिया सेठ का था, बस लौटा दिया"
अपनी पूरी जीवनभर की कमाई और पैतृक संपत्ति दान करने के बाद जब अमरजी से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने बेहद सादगी से जवाब दिया। अमरजी गौतम ने कहा, "मेरा अपना कुछ भी नहीं था, जो कुछ भी था वह सांवलिया सेठ का ही दिया हुआ था। मैंने तो बस उसे सही जगह और सही हाथों में वापस लौटा दिया है।" उनका यह त्याग अब केवल खेड़ा सामोर गांव में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में चर्चा और प्रेरणा का विषय बना हुआ है।



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