
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के प्रतिष्ठित मंच पर भारत के आदिवासी (Indigenous Peoples) समुदाय की ओर से अपनी बात रखने का एक ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण अवसर सामने आया है। भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के नेता और बांसवाड़ा-डूंगरपुर क्षेत्र से सांसद राजकुमार रोत ने इस वैश्विक मंच से भारत सरकार द्वारा लंबे समय से किए जा रहे उस दावे का तथ्यात्मक खंडन किया है, जिसमें कहा जाता रहा है कि भारत में कोई विशेष आदिवासी (Indigenous) समुदाय नहीं है। सांसद राजकुमार रोत ने स्पष्ट रूप से इस दावे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और देश के मूल निवासियों के अस्तित्व को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया।
अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत की विविधता को सामने रखते हुए सांसद राजकुमार रोत ने बताया कि देश में प्रोटो-ऑस्ट्रालॉइड, नीग्रिटो, द्रविड़ और मंगोलॉयड नस्लीय समूहों से संबंधित आदिवासी निवास करते हैं। वर्तमान में ये सभी अपनी अनूठी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान के साथ कुल 705 आदिवासी समूहों के रूप में संगठित हैं। देश के भीतर इन समुदायों की स्थिति को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान भारत के संविधान में इन आदिवासी समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) के रूप में मान्यता प्रदान की गई है, जिनकी वर्तमान जनसंख्या लगभग 14 करोड़ के करीब पहुंच चुकी है। इन पुख्ता आंकड़ों के आधार पर यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि भारत की अनुसूचित जनजातियां ही वास्तव में भारत की 'Indigenous Peoples' यानी मूल निवासी हैं।
इस वैचारिक पक्ष को और अधिक मजबूती देने के लिए संयुक्त राष्ट्र के मंच पर सांसद राजकुमार रोत ने देश की न्यायपालिका के ऐतिहासिक फैसलों का भी हवाला दिया। वक्तव्य के दौरान उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू द्वारा 'कैलाश बनाम महाराष्ट्र राज्य (2011)' के मामले में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय का विशेष उल्लेख किया। इस फैसले में न्यायमूर्ति काटजू ने स्पष्ट रूप से यह टिप्पणी की थी कि "अनुसूचित जनजातियां ही भारत के मूल निवासियों की वास्तविक वंशज हैं।"
संयुक्त राष्ट्र जैसे सर्वोच्च वैश्विक मंच पर देश के भील आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करना सांसद राजकुमार रोत के लिए न केवल व्यक्तिगत रूप से गर्व और सम्मान की बात रही, बल्कि यह क्षेत्र और समाज के लिए भी एक ऐतिहासिक क्षण था। उन्होंने कहा कि यह बुलंद आवाज केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने में रहने वाले करोड़ों आदिवासी भाई-बहनों की सामूहिक अस्मिता और हक की आवाज है। वक्तव्य का समापन उनके द्वारा पारंपरिक और गौरवमयी 'जोहार' के उद्घोष के साथ किया गया।
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